जानिए क्या है भगवद् गीता के दूसरे व तीसरे श्लोक का महत्व

संजय उवाच


दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌॥२॥

गीता (हिंदी भावानुवाद)

संजय ने कहा – हे राजन! पांडव पुत्रों द्वारा मेरी सेना की भी रचना देखकर राजा दुर्योधन अपने गुरु के पास गया और उससे यह शब्द कहे।

तात्पर्य- धृतराष्ट्र जन्म से अंधा था। दुर्भाग्यवश वह आध्यात्मिक दृष्टि से भी वंचित था। वह यह भी जानता था कि उसी के समान उसके पुत्र भी धर्म के मामले में अंधे हैं और उसे विश्वास था कि वह पांडवों के साथ कभी भी समझौता नहीं कर पाएंगे। क्योंकि पांचो पांडव जन्म से ही पवित्र थे। फिर भी उसे तीर्थ स्थान के प्रभाव के विषय में संदेह था। इसीलिए संजय युद्ध भूमि की स्थिति के विषय में उसके प्रश्न के मंतव्य को समझ गया अतः वह निराश राजा को प्रोत्साहित करना चाह रहा था। उसने उसे विश्वास दिलाया कि उसके पुत्र पवित्र स्थान के प्रभाव में आकर किसी प्रकार का समझौता नहीं करने जा रहे हैं। उसने राजा को बताया कि उसका पुत्र दुर्योधन पांडवों की सेना को देखकर तुरंत अपने सेनापति द्रोणाचार्य को वास्तविक स्थिति से अवगत कराने गया।

यद्यपि दुर्योधन को राजा कहकर संबोधित किया गया है तो भी स्थिति की गंभीरता के कारणों से सेनापति के पास जाना पड़ा। अतएव दुर्योधन राजनीतिज्ञ बनने के लिए सर्वथा उपयुक्त था किंतु जब उसने पांडवों की व्यू रचना देखी तो उसका यह गोटेदार उसके बाद कुछ पाना पाया।

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३॥

गीता (हिंदी भावानुवाद)

हे आचार्य! पाण्डूपुत्रों की विशाल सेना को देखें जिसे आप के प्रतिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र ने कौशल से व्यवस्थित किया है।

तात्पर्य- परम राजनीतिज्ञ प्रयोजन महान रावण खेड़ापति द्रोणाचार्य कराना चाहता था। उनकी पत्नी द्रौपदी के पिता राजा द्रुपद के साथ द्रोणाचार्य का कुछ राजनीतिक झगड़ा था। इस झगड़े के फल स्वरुप द्रुपद ने एक महान यज्ञ संपन्न किया जिससे उसे एक ऐसा पुत्र प्राप्त होने का वरदान मिला।द्रोणाचार्य का वध कर सके द्रोणाचार्य से भलीभांति जानता था, किंतु चंद्रगुप्त का पुत्र दृष्टद्युम्न युद्ध शिक्षा के लिए उस को सौंपा गया तो द्रोणाचार्य को उसे अपने सारे सैनिक रहस्य प्रदान करने में कोई झिझक नहीं हुई। अब दृष्टद्युम्न कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में पांडवों का पक्ष ले रहा था और उसने द्रोणाचार्य से जो कला सीखी थी उसी के आधार पर उसने यह व्यू रचना की थी।

दुर्योधन ने द्रोणाचार्य की जिस दुर्बलता को इंगित किया, इसे वह युद्ध में सजग रहें और समझौता न करे। इसके द्वारा वह द्रोणाचार्य को यह भी बताना चाह रहा था कि कहीं वह अपने प्रिय शिष्य पांडव के प्रति उदारता न दिखा बैठे। विशेष रुप से अर्जुन उसका अत्यंत प्रिय एवं तेजस्वी शिष्य था। दुर्योधन ने यह भी चेतावनी दी युद्ध में इस प्रकार की उदारता से हार हो सकती है।

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