पिथौरागढ़ जिला महिला अस्पताल में मोमबत्ती की लौ पर दूध गर्म करने को मजबूर प्रसूताएं
Source- Amar ujala

एक तरफ सरकार आम लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी ओर संसाधनों के अभाव में लोग इन सेवाओं से वंचित हो रहे हैं। यह हाल है उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के सबसे बड़े महिला अस्पताल का, जहां 21वीं सदी में भी प्रसूताएं मोमबत्ती की लौ पर दूध गर्म कर नवजात बच्चों को पिलाने के लिए मजबूर हैं, लेकि शासन-प्रशासन की नजर अभी तक महिलाओं की पीड़ा पर नहीं पड़ी।

पिथौरागढ़ जिला महिला अस्पताल में पड़ोसी देश नेपाल से भी इलाज कराने आते हैं। औसतन प्रतिदिन 4-5 सामान्य और 2-3 सिजेरियन प्रसव होते हैं। समान्य प्रसव वाली महिलाओं को दो दिन में घर भेज दिया जाता है लेकिन सिजेरियन प्रसव वाली महिलाओं को एक सप्ताह तक अस्पताल में भर्ती किया जाता है। ऐसे में सिजेरियन महिला के भर्ती रहने के दौरान नवजात बच्चे की देखरेख तीमारदार करते हैं।

प्रसव के बाद कुछ मामलों में नवजात बच्चे मां का दूध नहीं पीते, जिस वजह से उन्हें गाय का दूध पिलाया जाता है। सर्दियों में दूध ठंडा होने की वजह से उसे गर्म करने की जरूरत पड़ती है लेकिन जिला महिला अस्पताल मे बच्चों के लिए दूध गर्म करने की व्यवस्था नहीं है और अस्पताल के पास कैंटीन नहीं होने से परेशानियां और भी बढ़ जाती है। दिन में तो किसी तरह व्यवस्था की जा सकती है पर रात्रि के समय परेशानियां बढ़ जाती है।

मोमबत्ती की लौ पर दूध गर्म करने को मजबूर

बच्चों के लिए दूध गर्म करने के लिए तीमारदार या महिलाएं मोमबत्ती की लौ पर गर्म करती है। जिसकी वजह से उन्हें काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, परंतु आज तक महिलाओं का दर्द शासन-प्रशासन को नजर नहीं आया। लोगों का कहना है कि कम से कम नवजात बच्चों के लिए दूध गर्म करने के लिए प्रत्येक वार्ड में हीटर या इलैक्ट्रिक कैटल की व्यवस्था होनी चाहिए।

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