अमेरिकी वैज्ञानिकों का दावा भारत में इसलिए नहीं होगा कोरोना वायरस का अधिक असर

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दुनियाभर को कोरोना ने अपनी गिरफ्त में ले रखा है. ऐसे में इससे बचाव के लिए बड़े स्तर पर रिसर्च कार्य जारी हैं. अमेरिका की एक ऐसी रिसर्च सामने आई है, जो भारत के लिए राहत भरी सिद्ध हो सकती है. अमेरिका (US) के न्यूयार्क इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजी (NIT) के डिपार्टमेंट ऑफ बायोमेडिकल साइंसेस ने अपनी एक स्टडी में दावा किया है कि जिन देशों में टीबी (TB) की रोकथाम के लिए बच्चों को बेसिलस कामेट गुएरिन यानी बीसीजी (BCG) का टीका लगाया जाता है, उनमें कोरोना वायरस की चपेट में आने का खतरा कम है.

इसलिए हमारे लिए यह बड़ी राहत भरी खबर है कि खुद अमेरिका ने यह माना है कि भारत पर कोरोना वायरस का कम प्रभाव पड़ेगा.

बता दें कि भारत में साल 1962 में नेशनल टीबी प्रोग्राम की शुरूआत की गई थी. इसलिए बच्चे के पैदा होने के 6 महीने के अंदर यह टिका लगा दिया जाता है. इसलिए यह पक्का है कि देश की बहुसंख्यक आबादी को यह टीका लग चुका है.

सांस से जुड़ी समस्याओं की रोकथाम करता है बीसीजी का टीका

बीसीजी टीके में इंसानों में फेफड़ों की टीबी का कारण बनने वाले बैक्टेरिया की स्ट्रेन्स होती हैं. इस स्ट्रेन का नाम मायकोबैक्टिरियम बोविड है. टीका बनाने के दौरान एक्टिव बैक्टीरिया की ताकत घटा दी जाती है ताकि ये स्वस्थ इंसान में बीमारी न फैला सके. शोध में सामने आया है कि बीसीजी वैक्सीन वायरस से सीधा मुकाबला नहीं करती है. बल्कि यह बैक्टीरिया से मुकाबले के लिए इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करता है. इसलिए शरीर बैक्टेरिया के अटैक को आसानी से सहन कर लेता है

इस स्टडी के बाद कई देशों ने शुरू की बीसीजी वैक्सीन

गौतलब है कि अमेरिका की इस स्टडी के सामने आने के बाद कोरोना से बचाव के लिए कई देशों ने बीसीजी वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल शुरू कर दिए हैं. इन देशों में ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड, जर्मनी और ब्रिटेन का नाम शामिल है. इन देशों ने कोरोनावायरस संक्रमितों के इलाज में लगे स्वास्थ्यकर्मियों को बीसीजी का टीका लगाकर ह्यूमन ट्रायल शुरू करने की घोषणा कर दी गई है.

जिन देशों में लोगों को बीसीजी टिका नहीं लगा वहां मौतों का आंकड़ा अधिक

रिसर्च में यह भी सामने आया है कि कोरोना संक्रमण से वे देश अधिक प्रभावित हुए हैं, जहां बीसीजी टीका की पॉलिसी नहीं है या बंद कर दी गई है. ऐसे देशों में स्पेन, इटली , अमेरिका , लेबनान, नीदरलैंड और बेल्जियम शामिल हैं. क्योंकि की यहां बीसीजी का टीकाकरण नहीं किया जाता.

वहीं दूसरी ओर भारत, जापान, ब्राजील में बीसीजी टीकाकरण लंबे समय से हो रहा है. इसलिए अन्य देशों की तुलना में इन देशों में कोरोना संक्रमण और मौतों के आंकड़े कम हैं.

वैसे चीन में भी बीसीजी टीकाकरण होता है, लेकिन यह कोरोना का केंद्र था इसलिए यहां कोरोना ने ज्यादा पैर पसारे.

बीसीजी टीकाकरण वाले देशों में संक्रमण का खतरा 10 गुना कम
वैज्ञानिक ने पाया कि जिन देशों में बीसीजी टीकाकरण होता है वहां कोरोना फैलने का खतरा 10 गुना कम है. जबकि जिन देशों में बीसीजी टीकाकरण नहीं हुआ है, वहां कोरोना का खतरा 4 गुना अधिक है.

बता दें कि ईरान में 1984 में बीसीजी टिके की शुरूआत हुई थी, इसलिए माना जा रहा है कि 36 साल तक की उम्र के लोगों को टीका लग चुका है, इसलिए बुजुर्ग इसका अधिक शिकार हो रहे हैं.

भारत में मिला वायरस इंसान को मजबूती से जकड़ने में असमर्थ

वैज्ञानिकों ने शोष में यह भी पाया है कि भारत में फैला कोरोनावायरस लोगों को अधिक अपनी चपेट में नहीं ले पाएगा. क्योंकि भारत में मिले वायरस के स्ट्रेन और इटली, स्पेन व अमेरिका में मिले स्ट्रेन एक-दूसरे से अलग है. भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया है कि भारत में मिला वायरस सिंगल स्पाइक है, जबकि इटली, चीन और अमेरिका में मिले वायरस में ट्रिपल स्पाइक हैं.

अर्थात भारत में फैल रहा कोरोना वायरस इंसानी कोशिकाओं को अधिक मजबूती से नहीं पकड़ पाएगा. बल्कि अन्य देशों में फैला ट्रिपल स्पाइक वाला वायरस कोशिकाओं को मजबूती से अपने शिकंजे में ले लेता है.

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