उत्तराखंड की ऐपण गर्ल की राखियां हुई लोकप्रिय, राखियों पर गढ़वाली-कुमाऊनी में लिखा भेजी और दाजू

हिन्दू लाइव डेस्क – उत्तराखंड के ऐपण गर्ल की राखियां इस समय लोगों मेंं काफी लोकप्रिय हो रही है. विभिन्न राज्यों के लोगों द्वारा इन राखियों को मंगाया जा रहा है.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में सभी से वोकल फ़ॉर लोकल की बात की थी. जिस ऐपण गर्ल ने पूरे तरीके से चरितार्थ कर दिखाया.

यह भी देखें उत्तराखंड में अनुपस्थित रह रहे 20 चिकित्सकों पर हुई कार्यवाही

उत्तराखंड की ऐपण गर्ल केे बारे में

उत्तराखंड की ऐपण गर्ल के नाम से प्रसिद्ध मीनाक्षी खाती नैनीताल जिले में स्थित रामनगर क्षेत्र की निवासी हैं. इन्होंने अपनी शिक्षा रानीखेत और छोई से प्राप्त की, मीनाक्षी खाती अभी बीएससी तृतीय वर्ष की छात्रा है.

द ऐपण गर्ल में बचपन से है कला का शौक

मीनाक्षी को बचपन से ही पेंटिंग का शौक रहा है, बचपन में अपनी अम्मा और मां को देकर इन्हें पढ़ बनाने की प्रेरणा मिली है, जिसके कारण मीनाक्षी का इस कला के प्रति लगाव बढ़ता ही गया. अपन की बारीकियां उन्हें अपने मां और अम्मा से सीखने को मिली. मीनाक्षी द्वारा बनाई गई स्वदेशी राखियां लोगों द्वारा काफी पसंद की जा रही है.

यह भी देखें उत्तराखंड के शहरी क्षेत्रों में फिर से लौट रहा कोरोना, बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं मामले

लोक भाषा गढ़वाली और कुमाऊनी में बनाई राखियां

मीनाक्षी द्वारा बनाई गई पहाड़ी राखियां काफी चर्चा में है. इन राखियों में इन्होंने लोकल भाषा के शब्द जैसे भुला, ईजा, बैनी आदि का प्रयोग किया है जिस पर इन्हें लोगों से काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है.

महिलाओं को भी मिल रहा रोजगार

मीनाक्षी खाती के द्वारा महिलाओं को ट्रेनिंग दी जाती है. जिसके बाद सब टीम का हिस्सा बनकर काम करते हैं. मीनाक्षी द्वारा शुरू किया गया प्रोजेक्ट मिनाकृति – द ऐपण प्रोजेक्ट’ के नाम से चलाया जा रहा है. जिसमें अभी तक 30 महिलाएं काम करती हैं. उत्तराखंड टूरिज्म के सहयोग से मीनाक्षी ने अभी दिल्ली में प्रदर्शनी लगाई थी. जिसे लोगों द्वारा काफी पसंद किया गया

ऐपण गर्ल से मशहूर मीनाक्षी अब युवा पीढ़ी के लिए एक मिसाल बन गई है. मीनाक्षी द्वारा लोक कला ऐपण को पुनर्जीवित कर और सांस्कृति का प्रचार प्रसार करना वाकई काबिले तारीफ है. ग्रामीण और शहरी ऐपण कलाकारों को इस के माध्यम से रोजगार के अवसर दिए जा रहे हैं. मीनाक्षी के इस कदम से राज्य, देश और विदेशों में लोक कला की लोकप्रियता बढ़ रही है.