उत्तराखंड में धूमधाम से मनाया गया हरेला पर्व, पर्यावरण को लेकर मिला एक संदेश

हिन्दू लाइव डेस्क – उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में आज बड़ी धूमधाम से हरेला पर्व मनाया गया. वृक्षारोपण कर पर्यावरण को बचाने का दिया संदेश.

हरेला पर्व के बारे में

हरेला उत्तराखंड के महत्वपूर्ण पर्व में से एक है. हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार सावन माह के शुरू होने से 9 या 10 दिन पहले बोया जाता है. और यह एक पवित्र जगह पर बोया जाता है. जिसके बाद इसको प्रतिदिन पानी दिया जाता है और गुड़ाई भी की जाती है. सावन मास की पहली गते ( तारीख हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार) को इसे काटते हैं.

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हरेला काटने के बाद सर्वप्रथम इसे अपने इष्ट देवताओं को चढ़ाया जाता है. घर के बड़े बुजुर्गों के द्वारा हरेला को आशीर्वाद के रूप में सिर पर रखा जाता है.

हरेला पर्व को पर्यावरण दिवस के रूप में भी मनाया जाने लगा

उत्तराखंड वासी पहले ही पर्यावरण के प्रति सजग रहे हैं. उत्तराखंड के लोगों द्वारा अब हरेला के दिन वृक्षारोपण भी किया जाता है. आज उत्तराखंड के तमाम जिलों में इस उपलक्ष में वृक्षारोपण किया गया. लोगों द्वारा किए गए वृक्षारोपण की तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही है.

यदि आप दूसरे राज्यों से है तो आप इस गाने को सुनकर हरेला के बारे में थोड़ा बहुत समझ सकते हैं

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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने दी शुभकामनाएं

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने हरेला पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि समाज के उन सभी लोगों का धन्यवाद जो धरती को हरा भरा बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि इस वर्ष हमारा हरेला महोत्सव को धूमधाम से मनाने का लक्ष्य लगा था, परंतु कोविड-19 की वजह से यह टालना पड़ा.

हरेला पर्व

आपको बता दें कि आज हरेला के उपलक्ष में देहरादून जिले में लगभग 350000 पौधे लगाए गए. जिसमें से परवा दून में करीब एक लाख, पछवा दून में 130000, जौनसार में 71000 और देहरादून में करीब 50000 पौधे लगाए गए.

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी दी शुभकामनाएं

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने शुभकामनाएं देते हुए अपने देहरादून आवास में परिवार के साथ हरेला महोत्सव के अवसर पर वृक्षारोपण किया.

हरेला पर्व

उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में हरेला पर्व काफी धूमधाम से मनाया गया है. सभी जिलों में इस पर्व के उपलक्ष में वृक्षारोपण किया गया. आधुनिकता की इस दौड़ में उत्तराखंड वासी जिस तरह से अपनी संस्कृति को लेकर चल रहे हैं वह वाकई काबिले तारीफ है.