यूपी वन निगम के ट्रांसफर में खेल उजागर हुआ है। ताजा मामला तो सिर्फ उदाहरण है, यह समझने के लिए पर्याप्त है कि निगम के आला अफसर नियमों को ताक पर रखकर ट्रांसफर में किस तरह खेल कर रहे हैं। यूपी वन निगम में गणेश शाही, सहायक वर्ग—3 के पद पर गोरखपुर लैंगिंग प्रभाग में कार्यरत हैं। बीते 30 जून को प्रशासनिक आधार पर उनका तबादला इटावा कर दिया गया। पांच जुलाई को डीएलएम गोरखपुर ने उन्हें अवमुक्त भी कर दिया। विभागीय जानकारों का कहना है कि फिर उसी डीएलएम ने प्रबंध निदेशक, वन निगम के दवाब में शाही को गोरखपुर में ही उसी पद पर ज्वाइन करा लिया, जबकि अभी तक शाही के ट्रांसफर आदेश में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

नियुक्ति के समय से ही गोरखपुर में तैनात हैं शाही

गणेश शाही निगम में अपनी नियुक्ति के समय से ही गोरखपुर में तैनात हैं। वर्ष 2016 में प्रशासनिक आधार पर उनका तबादला मेरठ हुआ था। पर फिर महज कुछ महीनों में ही उनका तबादला फिर गोरखपुर हो गया। तबसे वह लगातार गोरखपुर में ही तैनात हैं। इस बार उनका तबादला इटावा किया गया। पर शाही को रिलीव करने के बावजूद डीएलएम गोरखपुर को दोबारा वहीं ज्वाइनिंग करानी पड़ी।

यूपी वन निगम में अनियमितता करने वालों का काकस कितना मजबूत है। इससे समझा जा सकता है। हालांकि स्थानातरण नियमावली में स्पष्ट प्रावधान है कि तीन साल तक एक ही जगह पर तैनात रहे कार्मिकों को अन्यत्र स्थानान्तरित किया जाए। ​मगर नियमावली के प्रावधान सिर्फ फाइलों की ही शोभा बढा रहे हैं।

आखिर शाही के तबादला प्रकरण को लेकर इसलिए उठ रहा सवाल

आपको बता दें कि वर्ष 1986—87 में शाही की नियुक्ति निगम में दैनिक वेतन कर्मी के तौर पर महज 450 रूपये प्रति माह की सैलरी पर हुई थी। 1991 में जब समान कार्य पर समान वेतन का प्रावधान लागू हुआ। तब उनकी सैलरी बढकर 800 रूपये प्रतिमाह हो गयी। वर्ष 2011 में वह नियमित हुए। उस समय उनका वेतन 10 से 11 हजार रूपये था। वर्तमान में उनकी सैलरी लगभग 30 हजार रूपये प्रतिमाह है। इसके विपरीत उनकी संपत्ति में दिन दोगुना रात चौगुना इजाफा हुआ।

शिकायत हुई तो जांच में आरोपों की पुष्टि भी हुई। क्षेत्रीय प्रबंधक ने आरोपों की पुष्टि के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं कि सिर्फ एमडी वन निगम को उनके स्थानान्तरण की सिफारिश कर दी और उसी आधार पर उनका ट्रांसफर इटावा हुआ था।