उत्तराखंड: कांग्रेस-भाजपा ने गढ़वाल को किया दरकिनार

उत्तराखंड की पांचवीं विधानसभा चुनाव के बाद राज्य में एक के बाद एक राजनीतिक बदलाव दिख रहे हैं। उत्तराखंड की राजनीति में अहम मुद्दा गढ़वाल कुमाऊं को लेकर राजनीति पार्टियां सामंजस्य स्थापित करने की पूरी कोशिश करती थी लेकिन 2022 के चुनाव के बाद दलों ने क्षेत्रीय समीकरणों में उलझ नहीं रहे हैं और यही वजह है कि कांग्रेस-भाजपा द्वारा गढ़वाल को दरकिनार किया गया।

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उत्तराखंड की राजनीति में गढ़वाल के नेताओं की अच्छी खासी पकड़ रही है। यही वजह है कि एनडी तिवारी के बाद गढ़वाल के 5 नेता सीएम बने हैं। 2022 चुनाव से कुछ समय पहले भाजपा ने खटीमा विधायक पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाकर नई जिम्मेदारी सौंपी, हांलांकि प्रदेश अध्यक्ष के रूप में मदन कौशिक की ताजपोशी की गई, जिसके बाद पर्वतीय जिलों में खालीपन महसूस किया जा रहा है।

उत्तराखंड में भाजपा को मिला बहुमत

उत्तराखंड की पांचवीं विधानसभा के लिए 14 फरवरी को मतदान और 10 मार्च को को रिजल्ट घोषित हुए, जिसमें भाजपा को 47 और कांग्रेस को 18 सीटें मिली। अकेले गढ़वाल क्षेत्र से भाजपा को 29 सीटों पर बहुमत मिला जिसके बाद यह उम्मीद लगाई जा रही थी कि गढ़वाल के नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है लेकिन भाजपा आलाकमान ने पुष्कर धामी पर भरोसा जताया और दुबारा मुख्यमंत्री बनाया। हरिद्वार को छोड़ दें तो गढ़वाल के अन्य जिलों से अधिकतर भाजपा जीत दर्ज करने में कामयाब रही लेकिन इन जिलों के बड़े नेताओं को अहम जिम्मेदारी देने से भाजपा ने दूरी बना ली।

हार के बाद कांग्रेस में इस्तीफा का दौर

चुनाव में कांग्रेस 18 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी और कांग्रेस के कई बड़े नेता अपनी सीट बचाने में नाकामयाब रहे। जिसके बाद इस्तीफा का दौर जारी हुआ, जिसके बाद नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष का पद खाली हो गया था। कांग्रेस ने भी भाजपा की राह अपनाते हुए गढ़वाल से दूरी बनाई और दोनों पदों की जिम्मेदारी कुमाऊं के नेताओं को सौंप दी। कांग्रेस ने यशपाल आर्य को नेता प्रतिपक्ष तथा करन माहरा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया।

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कांग्रेस-भाजपा गढ़वाल को दरकिनार

उत्तराखंड गठन के बाद यह पहली बार हुआ है कि कांग्रेस-भाजपा ने गढ़वाल को दरकिनार किया और ना ही राजनीति समीकरणों को जुटाने की कोशिश की। बहरहाल दोनों दलों की यह रणनीति कितनी कारगर साबित रहेगी यह तो आने वाले दिनों में ही पता चल पाएगा, लेकिन यदि दोनों पार्टियां इस राजनीति में सफल हो जाती है तो यह उत्तराखंड की राजनीति का एक नया अध्याय होगा।