जिनके पैरों में नहीं थे जूते, उनके हाथ में थमाई कलम, जानिए पहाड़ की बेटी संगीता कोठियाल फरासी के दरियादिली की कहानी

एक ओर जहां आम लोग, देश में व्यापक बेरोज़गारी, गरीबी, असाक्षरता जैसी समस्याओं के लिए प्रशासन को कोस कर सब कुछ सरकार भरोसे छोड़ देते है वहीं दूसरी ओर हमारे समाज में श्रीमती संगीता कोठियाल फरासी जैसे लोग भी है, जो खुद एक सरकारी विद्यालय में शिक्षिका रहते हुए भी गरीब और अपेक्षित बच्चों को अपने ख़र्चे पर पढ़ाकर न केवल इन समस्याओं का यथासम्भव हल खोजते है ब्लकि इनके निदान में लगातार कार्यरत रहते हैं l

बचपन से सपना था, अध्यापक बनने का

हिंदु लाइव के साथ ख़ास बातचीत में श्रीमती संगीता कोठियाल फरासी ने बताया कि वह बचपन से ही उनका सपना था कि वह अध्यापिका बने और शिक्षा के मोती हर तबके तक पहुंचाए l इन्हीं विचारों के साथ उन्होंने लखनऊ के आसपास के गाँव से श्रीनगर, गढ़वाल आए गरीब परिवारों के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया l हालांकि इस कार्य में उनकी दिक्कतें भी काफ़ी झेलनी पड़ी !

शुरुआत में किया काफी मुश्किलों का सामना


इन परिवारों के लिए तो दाना पानी जुटाना सबसे बड़ी समस्या है l थाली में रोटी हो, बदन पर कपड़े और सर पर छत इनके लिए तो यही जीत भी है और ज़रूरत भी, शिक्षा तो इनकी सूची में बहुत पीछे है l संगीता जी बताती है कि शुरूवात के दिनों में बच्चों के माँ – बाप उनको पढ़ाने में खासी रुचि नहीं दिखा रहे थे l कई बार बच्चों को टाॅफी का लालच देना पड़ा , उनके लिए राशन – पानी की व्यवस्था की तब कहीं वो पढ़ने के लिए तैयर हुए ! वैसे भी बाल मन कहाँ शिक्षा का मोल जान पाता है, और खानाबदोश बच्चों का तो पूरा बचपन ही अक्सर कूड़े के ढ़ेर में खोजबीन करते निकल जाता है l

जानिए पहाड़ की बेटी संगीता कोठियाल फरासी के दरियादिली की कहानी


दृढ़ इच्छा शक्ति ने फ़िर कुछ ऐसा जादू किया कि देखते ही देखते सभी बच्चे स्वच्छा से संगीता जी से पढ़ने आने लगे l समाजिक हित के इस कार्य में संगीता जी का उनके पति श्री अनसुया प्रसाद फरासी जी ने भी कई बार मनोबल बढ़ाया है l संगीता जी न केवल आर्थिक रूप से वंचित बच्चों को पढ़ाती है ब्लकि उनके व उनके परिवार के लिए अन्य सामाजिक संस्थाओं की सहायता से स्वास्थ्य शिविर और उन्हें स्वावलंबी बनाने हेतु स्टॉल लगाकर उन्हें कौशल में भी निपुण बना रही हैं जिससे उनके लिए रोज़गार के साधन भी उपलब्ध हो सकेंl

संगीता कोठियाल फारसी ने शिक्षा का सारा खर्च अपनी जेब से दिया


लॉकडाउन के कारण जब इन बच्चों को अपने परिवार के साथ वापिस लखनऊ जाना पड़ा तो संगीता जी इनकी आगे की शिक्षा को लेकर काफ़ी चिंतित थी, बाकी बच्चों की तरह ऑनलाइन पढ़ाई की सुविधा इनके पास नहीं थीं l इनके नंगे पैर को किसी के पुराने जूते मिल जाए इनके लिए तो वही उपलब्धी बन जाती है, मँहगे फोन और डाटा पैक के ख़र्चे से परिपक्व हुई ऑनलाइन शिक्षा का बोझ आखिर ये उठाए भी कैसे? लेकिन यहां भी संगीता जी उनके लिए वरदान बनकर आई, और उनकी शिक्षा का खर्च अपनी जेब से भरने का फ़ैसला किया l

कई पुरस्कारों से सम्मानित है, संगीता कोठियाल फारसी

संगीता कोठियाल जी को युं तो कई पुरुस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है जिनमें प्रगतिशील सशक्त नारी सम्मान 2020, उत्तराखंड उदय सम्मान 2019 शामिल हैं साथ ही इन्हें शिक्षक दिवस के अवसर पर दूरदर्शन केंद्र देहरादून में भी ‘ वर्तमान शिक्षा प्रणाली और सृजनात्मक शिक्षा’ पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया गया था लेकिन एक शिक्षक के पढ़ाए हुए छात्र किसी अच्छे आयाम पर पहुंचे उनके लिए तो वही सबसे बड़ा सम्मान है l समाज के हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जिनका सेवा भाव किसी सरकारी सहायता या परिस्थिति का मोहताज नहीं l