उत्तराखंड की लोक भाषाओं का संरक्षण एवं प्रसार के लिए नीलम ने लिखी कविता, पढ़ें

न्यूज़ डेस्क चमोली- जहां इस समय युवा पीढ़ी अंतरराष्ट्रीय भाषाओं को सीखनेे में अपनी रुचि दिखा रही है, जिससे कि स्थानीय भाषा अपने ही क्षेत्र में पिछड़ रही है। ऐसे मेंं अभी भी कुछ लोग उत्तराखंड की लोक भाषाओं के संरक्षण एवं प्रचार प्रसार कर रहे हैं।

भारत देश विश्व में इकलौता देश हैै जहां कई भाषाओं की भूमि है। भारत में एक लोकप्रिय कहावत है ”कोस कोस पर पानी बदले 4 कोस पर वाणी”। उत्तराखंड राज्य में भी मुख्यतः दो भाषाएं गढ़वाली और कुमाऊंनी बोली जाती है, परन्तु आधुनिक युग में यह भाषाएं अब अपना अस्तित्व खोती हुई नजर आ रही है।

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उत्तराखंड की लोक भाषाओं के संरक्षण पर नीलम रावत ने लिखी यह कविता

उत्तराखंड की लोक भाषाओं के संरक्षण हेतु चमोली के नीलम रावत अपनी इस भाषा का प्रचार प्रसार अपनी कविता के माध्यम से कर रही हैं, अभी तक नीलम रावत ने लगभग 100 से अधिक कविताएँ हिंदी, गढ़वाली, शायरी, मुक्तक आदि लिख चुकी है।

आपको बता दें कि उत्तराखंड में 1 सितंबर को कुमाऊनी और 2 सितंबर को गढ़वाली भाषा दिवस मनाया जाता है। गढ़वाली भाषा के अवसर पर चमोली की नीलम रावत के द्वारा गढ़वाली भाषा को बचाने हेतु बहुत ही खूबसूरत कविता लिखी है, जिसकी तारीफ रुड़की के विधायक प्रदीप बत्रा ने भी की है उन्होंने अपने सोशल मीडिया से यह कविता शेयर की है।

उत्तराखंड की लोक भाषाओं के संरक्षण एवं प्रचार प्रसार करती
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चमोली की नीलम रावत

नीलम रावत ने हिन्दू लाइव टीम को बताया की इन्होंने अब तक के सफर में कई यात्रावृतांत पढ़े हैं खासकर राहुल सांकृत्यायन अजय सोडानी आदि को पढ़ा है। उत्तराखण्ड को पढ़ने में भी इन्हें बहुत पसंद है। उत्तराखण्ड के इतिहास और साहित्य को विभिन्न किताबो और पत्रिकाओं के माध्यम से पढ़ती हैं। अमृता प्रीतम और हरिओम पंवार जी की भी बहुत बड़ी फैन है।

उत्तराखण्ड के नए लेखकों नवल खाली (भरत्तु की ब्वारी) , हरदेव नेगी, उपासना बेंजवाल, नीतीश भंड़ारी, ओमप्रकाश सेमवाल, ललित गुसाईं की कविताएं भी पढ़ी हैं। गढ़वाली हास्य कवि मुरली दिवान जी एवम तेजपाल रावत की बचपन से ही प्रंशशक है।
नीलम रावत द्वारा अपने विचारों और कविताओं को घाटियों की गूंज नामक ब्लॉग पर लिखते रहती है आप वहां पर जाकर उनकी कविताएं पढ़़ सकते हैै।