पर्यावरण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी स्टेट इन्वायरमेंट रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है कि पिछले सौ सालों में बारिश की निरंतरता और समयावधि में बदलाव से उच्च हिमालयी क्षेत्र के पेड़-पौधों में कई प्रकार के बदलाव आ रहे हैं जिसके कारणवश हिमालयन ट्री लाइन तेजी से पीछे खिसक रही है।

बारिश में सबसे ज्यादा कमी पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर, अल्मोड़ा और नैनीताल में देखी गयी जबकि देहरादून, चमोली,पौड़ी, टिहरी और उत्तरकाशी में भी औसत बारिश में गिरावट दर्ज की गई।

रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले सौ सालों के दौरान उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बारिश की निरंतरता और अवधि में आए परिवर्तन को हिमालयी पर्यावरण में आ रहे बदलाव के लिए जिम्मेदार बताया गया है।

पहाड़ी इलाक़ों में जंगल भी हो रहें हैं प्रभावित

रिपोर्ट के अनुसार, बारिश कम होने से इन क्षेत्रों में तापमान बढ़ रहा है। इस कारण बांझ और साल जैसे पौधे उपयुक्त वातावरण प्राप्त करने के लिए अधिक ऊंचाई पर उग रहे हैं, इससे न केवल भूभाग में ब्लकि हिमालयन ट्री लाइन में भी बदलाव आ रहा है। साथ ही वनों की सघननता और क्षेत्रफल भी लगातार कम होता जा रहा है।

इस बदलाव का राज्य के इको सिस्टम पर भी असर पड़ रहा है। राज्य में हरिद्वार को छोड़कर बाकी सभी जिलों में बारिश के पैटर्न में काफी बदलाव आए हैं, इसका असर इन जिलों के वनों व जीव-जंतुओं पर भी देखा जा सकता है।

ट्री लाइन फैलने से सिकुड़ेंगे ग्लेशियर

विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयन ट्री लाइन के बढ़ने का सबसे ज्यादा असर ग्लेशियर अर्थात हिमखंड पर पड़ेगा। जितनी तेज़ी से ट्री लाइन ऊंचाई की तरफ बढ़ेगी, ग्लेशियर भी उसी तेज़ी से सिकुड़ते हुए पीछे चले जाएंगे। इससे आने वाले समय में प्राकृतिक आपदाएं भी बढ़ सकती हैं, जो किसी भी दृष्टि से अच्छी खबर नहीं है l यदि विकास के नाम पर इसी प्रकार प्रकृति का दोहन होता रहा तो मानव जाति का अस्तित्व भी इससे पृथक नहीं रहेगा l