अन्य राज्यों में अभिव्यक्ति की आजादी का हल्ला मचाने वाली बीजेपी उत्तराखंड में चुप क्यूं?

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पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्य में बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ यदि वहां कि राज्य सरकार कुछ कदम उठाती है तो भारतीय जनता पार्टी अभिव्यक्ति की आजादी बोलकर पूरे देश में के लिए उनके लिए आवाज उठाती है, परंतु इसके विपरीत जब उत्तराखंड में भाजपा की सरकार होते हुए भी बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ कुछ होता है तो वहां बीजेपी मौन धारण कर लेती है।

उत्तराखंड का मामला 

दरसल सोशल मीडिया के माध्यम से उत्तराखंड के जागरुक युवाओं ने अवैध निमार्णों को लेकर ट्विटर पर एक अभियान चलाया था। जो ट्विटर पर ट्रेंड चलाया। जिसको लेकर बागेश्वर पुलिस ने गांव कुरशाली निवासी नरैन्द्र सिंह को थाने बुलाया गया था।

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माफीनामा के बाद FIR

नरेन्द्र सिंह ने हिन्दू लाइव टीम को बताया कि पुलिस ने उनसे लिखित रुप में माफीनामा लिखवाकर दुबारा ऐसी

गलती नहीं करने की चेतावनी दी, और साथ ही सारे ट्वीट डिलीट करवा दिए थे, परन्तू कुछ समय बाद कोर्ट से समन आने पर उन्हे पता चला कि उनके खिलाफ FIR दर्ज हो रखी है। ऐसे में अब कई सवाल खडे़ होना लाजिमी है।

  1. माफीनामा लिखवाने के बाद FIR क्यूं?
  2. आखिर किसके कहने पर माफीनामा के बावजूद हुई FIR ?
  3. क्या नरेन्द्र के स्थानीय मूद्दे उठाना स्थानीय नेताओं को रास नहीं आया ?
  4. क्या सोशल मीडिया पर मुद्दे उठाना गुनाह ?

 

नरेन्द्र ने बताया कि वह गांव में ही रोजगार करते है, और सोशल मीडिया के माध्यम से क्षेत्र की समस्याओं को उजागर करते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति सही ना होने के कारण उन्होंने कहा कि के बाद रुद्रपुर जाकर फैक्ट्री में काम करना शूरु किया। जहां उनकी उंगली कटने के बावजूद होने कहीं से कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई। जिसके बाद गांव आकर अपना स्वरोजगार चलाते है।

उन्होने बताया कि गांव के स्कूल बनने पर अपने खच्चर मैटेरियल ढुलाई पर लगाए थे, खुशी से कि गांव में स्कूल बन रहा है, लेकिन बाद में पेमेंट क्लियर करने के लिए ऑफिस वालों ने पैसे मांगे, फिर जेई ने कई बार फोन पर ऊपर वालों के नाम पर पैसे मांगे, तो इन्होंने कॉल रिकॉर्ड कर ट्विटर पर भी शेयर किया, साथ ही क्षेत्र की कई समस्याओं का मुद्दा सोशल मीडिया पर उठाया।

 

अब आशंका यह लगाई जा रही है कि कहीं नरेंद्र सिंह द्वारा समस्याओं का उजागर करने के चक्कर में केस तो दर्ज नहीं हुआ, वरना पहले तो माफीनामा से बात खत्म हो चुकी थी। सोमवार देर शाम को लोक अदालत में उन पर 500 का जुर्माना लगाकर बरी कर दिया।

क्या नरेंद्र सिंह के लिए अभिव्यक्ति की आजादी नहीं

आरएसएस स्वयंसेवक और बीजेपी सदस्य नरेन्द्र सिंह ने उत्तराखंड के बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर अवैध निर्माण हटाने के लिए आवाज उठाई थी। आखिर क्या उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी आवाज रखने का अधिकार नहीं है। दूसरे प्रदेशों में अपने कार्यकर्ताओं का साथ देने वाली बीजेपी आखिर उत्तराखंड में अपने कार्यकर्ताओं से किनारा क्यों।

आखिर आरएसएस स्वयंसेवक और बीजेपी सदस्य नरेंद्र सिंह को इतने समय में जो मानसिक प्रताड़ना हुई उसका जिम्मेदार कौन।

 


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